​!!सत्य!!

हम सब इस बात पर यकीन करते हैं कि जो आँखों से देखते हैं वही सच(सत्य) होता है। पर यह पूर्ण सत्य नहीं है। हम वो देखते हैं जो हमें दिखाया जा रहा है न कि सत्य,सत्य तो एक आभूषण है जो सत्यवादीहरिश्चन्द्र जैसे महापुरुष अपने गले का हार बनाते थे,उससे लड़ने व सामना करने की हिम्मत रखते थे। सत्य तो हमसे कोशों दूर रहता है जब तक की हम बात की गम्भीरता को न समझ पाएँ तब तक कि जब तक हमें वह पता लगे हमसे परे रहता है हमारी सोच से बहुत मील दूर और जब तक यकीनन वह ख्याल आता है वह ख्याल में ही रह जाता है। सत्य तो एक साधना है जो ऋषि मुनि किया करते थे पर आज के दूषित वातावरण व कलयुग के प्रभाव में वह सत्य केवल भाषा रूप ही महान व बड़ा समझा जाता है। सत्य की पहचान न हो इसलिए उसकी आँख पर पट्टि बांध दी गयी है,उसे कैद में रखे सैनिक व पहरेदार उसपर कड़ा प्रतिबन्ध लगाते हैं,जो सत्य है वह जाहिर ही नहीं होने देते। उसे ‘सत्यमेव जयते’ जैसे वाक्यों की तरह पहचान व महान बनाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है उसका दुरुपयोग किया जाता है,सत्य को गुप्त रखने और असत्य को प्रसिद्ध करने के लिए असत्य को ही सत्य समझ व स्वीकारा जाता है। उस सत्य का भान न हो सके इसलिए उसे अप्रगट रखा जाता है,उसकी पहचान ही लुप्त कर दी जाती है। उसे कहीं कोई कालकोठरी में बंद कर दिया जाता है भीतरी-भीतर प्रताड़ित व सताया जाता है,उसे ऐसा यकीन कराया जाता है कि वह सत्य कहीं समाप्त ही हो गया है जो समाज व देश के सामने आना चाहिए था। असत्य के सैनिक उस सत्य को उजागर न होने के लिए भरसक प्रयास करते हैं उसे ज़लील करते हैं उसे कमज़ोर और लाचार बनाते हैं, और कहीं न कहीं ये डर उन असत्य के डाकुओं में भी छुपा रहता है कि अगर सत्य सामने आ गया तो सत्ता का क्या होगा हमारा क्या होगा,कैसे हमने सत्य को उसकी कर्तव्य निष्ठता से विमुख किया आदि। उसे नकाब पहनाते हैं असत्य का सत्य को छुपाने के लिए क्या क्या प्रयत्न व जत्न नहीं करते जो आन पड़ता है वह करते हैं वेखोफ़ व वेझिझक। उस सत्य को सामने आने के लिए मौका ही नहीं देते। अगर मौका मिल या दे भी दिया जाता है तो उसे पूर्ण सत्य कहने का अधिकार नहीं होता,कदाचित् अधिकार मिल भी जाएँ तो वह असत्य के गिरोही पकड़ व उनके भयानक मुखौटे से डर कर  व उसी असत्य के गिरोह में खड़ा अपने को लाचार,कमज़ोर व वेसहरा समझ कर सत्य को जाहिर करने का साहस खो देता है। उसे इतना पीड़ित,असहायी व कमज़ोर किया जाता है कि वह अपना बजूद भी खो बैठता है, उसे हिंसक रीति से सताया जाता है। उसके हाज़िर होने की शक्ति व ऊर्जा के संचार को क्षति पहुँचाई जाती है,उसे मारने का पूरा प्रयास किया जाता है। पर उसके अंदर अब भी कोई अंधरूनी ताक़त मौजूद रहती है जिसके कारण वह अपनी चेतना को ही महसूस कर पाता है अपने पूरे वजूद को नहीं,वह इतना वेवश हो जाता है कि उसने सुने बचपन के आदर्श वाक्य”सत्य पराजित जो सकता है परास्त नहीं”जैसे महान वाक्यों से अब उसकी श्रद्धा धराशाही हो जाना चाहती है पर अब भी कहीं सोया अस्तित्व कहीं गर्त में पड़ा उसे यकीन दिलाता है कि अब भी देर नहीं हुई उस असत्य से जीतने की उससे लड़ो हिम्मत रखों और उसे दिखाओं की सत्य अब भी उतना ही धैर्यवान व श्रद्धावान है जितना उस सत्य को बंदी बनाने से पहले वह था,अब भी उसकी चेतना स्वस्थ व आजाद,स्वतंन्त्र है भारत की तरह अब कोई उसे पुनः बन्दी नहीं बना सकता अब सत्य स्थापित हो कर रहेगा,अब उसे कोई क्षति नहीं पहुँचा सकता,अब वह पूर्ण होश व विवेक से काम ले रहा है, जैसा वह था। अब वह उस महाभारत काल के अर्जुन की तरह है जो कभी हार नहीं मानता,कभी भी नहीं और वह पुनः उम्मीद की किरण को सबके सामने लाकर रहेगा जिसे असत्य के चोरों ने अपनी गिरफ़्त में कर लिया था। अब सत्य को कोई पराजित नहीं कर सकता,जब तक स्वयं उसका अस्तित्व है। 

“सत्यमेव जयते”

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